5 BHAGAVAT GEETA SHLOK IN HINDI
भगवत गीता श्लोक यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। "जब-जब धर्म की हानि होती है, अधर्म का उदय होता है, भारत! उस समय मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ, और धर्म की स्थापना के लिए खुद को उत्पन्न करता हूँ।" इस श्लोक का अर्थ है कि जब धर्म का पालन कम हो जाता है और अधर्म बढ़ जाता है, तब भगवान स्वयं अपने रूप में प्रकट होते हैं और धर्म की स्थापना के लिए कार्य करते हैं। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।। "कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, फलों के लिए कभी नहीं। फल के हेतुओं में मत पड़ो, और कर्म में भी मेरा संग न करो।" इस श्लोक में बताया गया है कि हमें कर्म करने का अधिकार है, लेकिन हमें फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। हमें केवल कर्म करने में लगना चाहिए और फल की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए। फल के लिए कर्म करना हमें बंधनों में डाल सकता है, जबकि निष्काम कर्म हमें मुक्ति की ओर ले जाता है| click here bhagwat geeta book in hindi न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा। ...